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Srimad bhagwat geeta में क्यों श्री कृष्ण के उत्तर अहम हैं ?

srimad bhagwat geeta

Srimad bhagwat geeta

Srimad bhagwat geeta ‘आराध्यवन का गीत’– एक महान भारतीय महाकाव्य के भीतर प्रकट होता है !

महाभारत, एक महान युद्ध की पूर्व संध्या पर नायक अर्जुन और उनके सारथी कृष्ण के बीच एक संवाद के रूप में !

लेकिन इसे बाकी हिस्सों से अलग बनाया गया था। काम; और इसके भीतर कृष्ण भगवान के अवतार हैं !

योग का मुख्या विषय परमात्मा का मिलन है !

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कृष्ण योग के तीन रूपों में भेद करते हैं:

1.ज्ञान का योग

2. कर्म का योग

3.भक्ति का योग

ये है भगवत गीता पड़ने के सही तरीके:

.विनम्रता के साथ

.ईमानदारी के साथ

.जिज्ञासा के साथ

.आध्यात्मिकता के बारे में जानने की सच्ची इच्छा के साथ

.भगवान कृष्ण के भक्त होने के मूड के साथ (कम से कम सैद्धांतिक रूप से)

.एक खुले और प्रगतिशील दृष्टिकोण के साथ

.वास्तविक शिक्षक के मार्गदर्शन में,आदि।

भगवद गीता आधुनिक वेदांत के 3 स्तंभों में से एक है (अन्य दो उपनिषद और ब्रह्म-सूत्र हैं) !

श्रीमद भगवद गीता को पड़ने के लिए कोई निश्चित समय की जरुरत नहीं है कभी भी अपने मन और श्रदा के अनुसार पद सकते है !

कई अलग-अलग भाषाओं में कई अनुवाद हैं। अपनी मूल भाषा में पढ़ें कि आप बेहतर समझ के लिए सहज हैं !

उद्देश्य आपका यही होना चाहिए की भगवत गीता में श्री कृष्ण जी के संदेश को समझना !

श्रीमत भगवत गीता में सात्सो श्लोक है , चोवीस श्लोक \ पूर्ण अध्याय विधि का मतलब है कि आप 1 चंद्र महीने में 1 पठन पूरा करेंगे !

 

Srimad bhagwat geeta में क्यों श्री कृष्ण के उत्तर अहम हैं?

कभी कभी लगता है जैसे युगों युगों से srimad bhagwat geeta को पड़ने समझने वाली सनातन सभ्यता के लोग

भगवान श्री कृष्णा के उत्तर को नहीं , अर्जुन के प्रश्नो को अधिक याद रखते है

अर्जुन के जो प्रश्न थे वे वास्तव में  एक मोहमाया में पड़े व्यक्ति की दुर्बलता थी  !

वह देख रहे थे की जिन योद्धाओं को वह अपना बंधु बांधव , गुरु , संबंदी , पितामह आदि समझ कर शस्त्र त्याग रहे थे ,

वो सभी अपने हाथों में अपने शस्त्र लेकर खड़े थे !

दुर्योधन की सेना में खड़ा हर योद्धा पांडवों के वध के निमित ही आया था !

फिर जो शत्रु हमारे सामने शस्त्र लेकर हमारा वध करने के लिए आया हो ,

शत्रु को अपना समझना दुर्बलता नहीं तो और क्या है ?

अर्जुन की यह दुर्बलता मित्रता की दुर्बलता है ! विडंबना ही है की ऐसा मोह सज्जनों के अंदर ही उतपन होता है !

दुर्जन अपने लक्ष्य के प्रति अडिग होते है , उन्हें कोई मोह नहीं रोक पाता !

उनको अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हर अनैतिक कार्य कर देना मंजूर होता है  !

हम अपने दैनिक जीवन को ध्यान से देखें तो पाएंगे की कई बार हम ऐसी दुर्बलता दिखते हुए विविध विषयों पर यह सोच

कर चुपी साध लेते है की इससे मुझे क्या ? इसने मुझे तो चोट नहीं दी::

इसका उत्तर देना मेरा काम नहीं , हम राज के नियमों के विरुद्ध कैसे जा सकते है::

हम हर वार अर्जुन की तरह शस्त्र त्याग देते है की हम सहीष्णु हैं , हमें शांत रहना है , हमें युद्ध नहीं करना::

अधर्म का प्रतिरोध न करना अन्याय है , ढोंग है !

भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से यही कहा था की हम किसी अन्यायी ,

अत्याचारी को केवल इसलिए क्षमा नहीं कर सकते की वह हमारा अपना है , संबंदी है , पड़ोसी है ::: नहीं !

अन्यायी को अपनी कथनी और करनी का दंड मिलना ही चाहिए !

शास्त्र कहते है की कभी अपात्र को दान देना नहीं चाहिए !

फिर किसी अपात्र को क्षमादान कैसे दिया जा सकता है ?

क्षमा करना भी अपात्र को अधर्म की श्रेणी में आता है !

भगवान श्री कृष्ण ने अपने युग के किसी भी अपराधी कोण क्षमा नहीं किया !

न अपने मामा कंस को , न कंस की बहन पूतना को , न पांडवों के भाईओ कौरवों को !

यहाँ तक पितामा भीष्म और गुरु द्रोणाचार्य को भी नहीं ,

अर्जुन और युधिष्टर को भी नहीं !

और तो और भगवान श्री कृष्ण ने अंत में अपने ही हाथों अपने नाती पोतों को भी दण्डित किया !

यही धर्म है , जिसकी स्थापना के लिए श्री कृष्ण आये थे !

दुनिया को अर्जुन के प्रश्न के साथ साथ , श्री कृष्ण के उत्तर भी याद रखने होंगे !

 

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