कहानी

शनि देव को छोटा कहने का दंड कैसे भुक्तना पड़ा राजा को!

शनि देव

कौन है शनि देव ?

शनि देव सूर्य पुत्र है, शनि देव को न्याय का  राजा कहा जाता है !

क्युकी इंसान जो भी कर्म करता है शनि देव उसे उसी प्रकार का फल देते है !

शनि देव एक राशि पे ढाई से साढ़े सात साल तक रहते है !

शनि देव का प्रिय रंग काला  है !

लोग शनि देव को प्रसन करने के लिए शनिवार को शनि मंदिर

में सरसो का तेल माह गुड़ काले तील काला कपड़ा चढ़ाते है और शनि देव का व्रत भी रखते है !

शनि मंत्र है जो की इस प्रकार है

 

नीलांजन समभावम,
रविपुत्र यमराजम,
चया मर्तंडा संभुतम्, तम् नमामि शनैश्चरम् ”तथा
“ओम शं शनैश्चराय नमः”

शनि देव को सबसे छोटा कहने का दंड कैसे भुक्तना पड़ा राजा विक्रमदित्य को!

एक दिन सातो ग्रह सूर्य ,चंद्र ,मंगल, बुध ,बृहस्पति, शुक्र और शनि बैठे हुए

इस बात का विवाद शेड बैठे के समस्त ग्रहो में से कोण सा ग्रह सबसे बड़ा है !

इसका निर्णय करने के लिए सभी ग्रह राजा इंद्र के दरबार में उपस्थित हुए !

राजा इंद्र ने सोचा यदि में किसी ग्रह को सबसे छोटा कहूंगा तो सब ग्रह मुझसे नाराज़ हो जायेंगे!

इसलिए उन्होंने कहा के में आप लोगो का निर्णय करने में असमर्थ हु ,

आप लोग पृथ्वी पर राजा विक्रमदित्य के पास जाइये वे बड़े न्याय प्रिये राजा है,

वे आपके मदद अवश्य करेंगे !

ये सुनकर सभी ग्रह राजा विक्रमदित्य के दरबार में उपस्थित हुए !

ये जानकर के मुझे इनमे से किसी एक को छोटा बताना है,

और किसी एक को बड़ा बताना है राजा धर्म संकट में पद गए,

परन्तु वे न्याय प्रिये राजा थे इसलिए उन्होंने न्याय करने का निश्चय किया !

राजा विक्रमदित्य किसी एक देवता को अपने मुँह से छोटा या बड़ा नहीं कहना चाहते थे!

इसलिए उन्होंने सभी ग्रहो के प्रिये धातु बनाकर इस क्रम में रख दिए,

के सोने का आसन सबसे पहले आया और लोहे का आसन सबसे बाद में !

आसन सोने चांदी, कांसी, पीतल ,सीसर, जस्ता ,अभ्रक और लोहे का था!

लोहे का आसन सबसे बाद में था वे शनिदेव का आसन था!

शनिदेव समझ गए की राजा विक्रमदित्य ने उन्हें सबसे छोटा कहा है !

अतः वे क्रोधित होकर बोले राजन तुम मेरे पराक्रम को नहीं जानते!

सूर्य एक राशि पर एक महीना चन्द्रमा सवा दो दिन

मंगल डेढ़ मास बृहस्पति तेरा महीने बुध और शुक्र केवल एक मास

और राहु तथा केतु उलटे चलते है परन्तु में एक राशि पर ढाई से साढ़े सात साल तक रहता हूँ!

राम पर साढ़े सती तो उसे राज्य के स्थान पर बनवास मिला,

और रावण पर जब शनि शनिदेव की साढ़े सती आयी तो उसके कुल का ही सत्यानास हो गया!

अब तेरी बारी है ऐसा कह शनिदेव वहा से चल गए!

समय अनुसार राजा विक्रमदित्य पर शनि शनिदेव की  साढ़े सती आयी!

उस समय शनिदेव घोड़ो का सौदागर बनकर उज्जैन में पधारे,

उन घोड़ो में एक घोडा इतना सुंदर था के राजा की तबियत उसकी सवारी करने के लिए ललचाई

राजा जैसे ही घोड़े पर बैठा घोडा हवा से बातें करता हुआ

ऐसा भागा के कुछ ही क्षणों में राजा को एक बीहड़ जंगल में पहुंचा दिया

राजा जंगल में मारे मारे फिरने लगे

चलते चलते राजा एक नगर में पहुंचे और उधर एक दुकान पर बैठ गए!

शनि महाराज की कृपा से उस दिन उस दुकान के सेठ को खूब आमदनी हुई!

उसने राजा को भाग्यवान पुरुष समझकर अपने यहाँ रखने का फैसला किया!

सेठ राजा को अपने घर ले गया जब राजा भोजन कर रहे थे,

तो उनकी नज़र दरवाज़े के खूँटी पर गई जिस पर नो लखा हार टंगा हुआ था

राजा की जैसे ही उस पर नज़र गयी खूँटी उस हार को देखते ही निगल गई!

सेठ कमरे में आया और खूँटी पर हार न पाया

तो उसने राजा को हार की चोरी के अपराध में पकड़वा दिया!

न्यायाधीश ने फैसला किया के राजा के दोनों हाथ और पैर काट दिए जाएं!

जब राजा चौरंगिया बन गया तो उस नगर के तेली को चौरंगिया पर दया आ गई

और वे चौरंगिया को उठा लाया और उसे कोल्हू के पीछे बिठा दिया ताकि बैल हाँक सके!

साढ़े सती बीतने में कुछ काल हे बचा था की चौरंगिया को मल्हार राग गाने की सूझी!

उसकी मनमोहक ध्वनि राजकुमारी के कानो में पड़ी

सुरीली आवाज़ को सुनकर राजकुमारी उस पर मनमोहित हो गई!

जब राजकुमारी को पता चला के रागी चौरंगिया है

तो राजकुमारी ने निश्चय कर लिया की

अगर वे विवाह करेगी तो उसी से करेंगी वरना आजीवन अविवाहित रहेंगी |

सुबह जब राजा और रानी को पता चला तो उन्होंने राजकुमारी को समझाने की बहुत कोशिश की

मगर राजकुमारी अपना निश्चय तोड़ने को त्यार नहीं थी!

विवश होकर राजा और रानी को मानना पड़ा!

राजा ने तेली को बुलाकर आदेश दिया की वो चौरंगिया के शादी राजकुमारी के साथ करने का इंतेज़ाम करे !

राजज्ञा  वश तेली को चौरंगिया और राजकुमारी के विवाह का इंतेज़ाम करना पड़ा!

चौरंगिया और राजकुमारी का विवाह करवा दिया गया !

वे साढ़े सती की अंतिम राशि थी !

उस रात के आधा बीतते ही चौरंगिया को शनिदेव स्वपन में दिखाई दिए

शनिदेव कहने लगे राजा तुमने मुझे छोटे कहने का दंड पा लिया है

राजा ने हाथ जोड़कर शमा मांगते हुए शनिदेव से कहा

के जैसा दुःख आपने मुझे दिया है ऐसा दुःख किसी और का न दीजियेगा

शनिदेव ने उसकी प्राथना स्वीकार कर ली!

आँख खुलने पर चौरंगिया ने देखा के उसके हाथ और पैर बिलकुल ठीक हो गए है

राजकुमारी ने भी जब अपने पति को पुराण स्वास्थ्य देखा तो उसकी खुशु की सीमा न रही!

होते होते ये समाचार नगर सेठ को मिला तो उसने राजा से क्षमा मांगी

और उन्हें अपने घर खाने पर ले गया जब राजा भोजन कर रहे थे!

सब लोगो ने आश्चर्य देखा के खूँटी हार उगल रही थी

ये कौतुक देखकर नगरसेठ को एक ऐसा अभिभूत हुआ

के उसने अपने कन्या का विवाह भी राजा विक्रमदित्य के साथ कर दिया!

जब राजा विक्रमदित्य अपनी राजधानी पहुंचे  तो सभी प्रजा ने राजा और दोनों रानियों का स्वागत किया !

पुनः राज्य पाने के बाद राजा ने राज्य में घोषणा करवा दी

की प्रत्येक प्रजाजन शनिवार को शनिदेव का व्रत व् पूजन किया करेगी !

और उसी दिन से राजा विक्रमदित्य हर शनिवार को शनिदेव का व्रत व् पूजन करने लगे

जो कोई भी शनिवार का व्रत या पूजन करता है शनिदेव उसकी हर मनोकामा पुराण करते है!

बोलो शनिदेव महाराज की जय !

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