त्यौहार

इस Mahashivratri पर्व पर कैसे करे शिव को प्रसन्न!

mahashivratri

Mahashivratri(महाशिवरात्रि)

Mahashivratri को शिव पार्वती का दिन कहा जाता है

क्युकी इस दिन शिव पार्वती का विवाह हुआ था !

हिन्दू धर्म के अनुसार महाशिवरात्रि बहुत धूमधाम से मनाई जाती है!

हर कोई इस दिन शिव पारवती की पूजा पूरी श्रद्धा के साथ शिव आराधना करते है !

कहा जाता है की जो कोई भी Mahashivratri के दिन शिव पार्वती की पूजा पूरी श्रद्धा के साथ करता है

उसकी हर मनोकामना पूर्ण होती है !

Mahashivratri का पर्व बच्चो से लेकर बजुर्गो तक में पूरे हर्ष और उल्लास से मनाया जाता है !

इस दिन मंदिरो में शिव पार्वती की मनमोहक झांकिया निकाली जाती है !

और इस झांकियो में सभी लोग बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते है !

Mahashivratri date ( महाशिवरात्रि तिथि )

इस बर्ष महाशिवरात्रि 11 मार्च 2021 दिन गुरूवार को है !

महाशिवरात्रि के सबंद में ऐसा माना जाता है की इस पर्व की रात्रि में भगवान शिव प्र्तेक शिवलिंगो में समाते है !

एक बार शिव लोक में घिरे बैठे भगवान शिव ने सभी भक्तो से कुछ न कुछ वर मांगने के लिए कहा !

इस पर एक भक्त ने कहा , प्रभु ! मैं मृत्युलोग में आपके दर्शन करना चाहता हु !

बताईये , कब और कैसे होगा ? इस पर भोलेनाथ बोले , ये दर्शन आपको फाल्गुन कृष्णपक्ष की चतुर्थी की अर्धरात्रि को होंगे

Mahashivratri पर्व पर कैसे करे शिव को प्रसन्न?

Mahashivratri के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि

में निवृत होकर भगवान शिव के मंदिर में जाकर उनकी पूजा करे!

सबसे पहले भगवान शिव को जल चढ़ाये

उसके बाद शिव पर दूद , दही , शहद , घी , विभूति,

शकर , बेलपत्र , धतूरा , भांग, फल फूल आदि अर्पित करे !

इसके बाद शिव के आगे धुप दीप करे

और दोनों हाथ जोड़कर शिव के आगे नतमस्तक हो जाए

और मन ही मन अपनी प्राथना पूर्ण होने का संकल्प ले !

जे आराधना शिव के आगे चार प्रहर की जाती है !

और शिव पर जल अर्पित करने के पश्चात कथा Mahashivratri व्रत कथा पड़ी जाती है !

जो की इस प्रकार है !

Mahashivratri puja vidhi ( महशिवरात्रि पूजा विधि )

Mahashivratri का व्रत रखने की इच्छा रखने वाले बुद्धिमान व्यक्ति ( पुरुष या इस्त्री ) को चाहिए की प्रात: काल उठकर

सर्वपर्थम भगवान शिव के तेजोमय शांत सबरूप का ध्यान करे !

फिर आलस्य को त्याग कर शौच – स्नान , संध्या आदि नित्यकर्मों

से निवृत होकर शिव मंदिर में जाए !

ध्यान रहे , पूजन व्रतादि प्रारम्भ करने से पूर्व माथे पर भस्म का तिलक या त्रिपुण्ड तथा गले mein

रुद्राक्ष की माला अवश्य धारण करनी चाहिए !

” ॐ त्र्यायुष जमदग्ने: ” मंत्र पड़ते हुए अपने मस्तक पर भस्म का त्रिपुण्ड – तिलक लगाना एबं ” ॐ नमः शिवाय ” बोलते हुए

गले में रुद्राक्ष की माला ( गंगा जल के छींटे देकर ) धारण करे !

व्रत हेतु पूर्वाभिमुख होकर * आसन पर बैठे – सर्वप्रथम आचमन कर , पवित्री की अंगूठी धारण करें !

अपने ऊपर तथा पूजन – सामग्री पर गंगा जल मिश्रित शुद्ध जल

के छींटे देवें तथा अर्ध में गंगाजल सहित शुद्ध जल , अक्षत ( चावल ) व् पुष्प डालकर व्रत हेतु शुभ संकल्प करे –

1)आसान – संकल्प , पूजा , मंत्र , जाप , ध्यान आदि शुभ कृत्य ऊनि , रेशमी , मृगचर्म

अथवा कुशासन पर बैठकर ही करने चाहिए !

2)कोई भी शुभ संकल्प , देव – पितृ कमीदे करने से पूर्व दाहिने हाथ की उंगली से शुध्दातु से निमृत

( सुवर्ण , चांदी आदि ) अंगूठी अवश्य धारण करनी चाहिए !

Mahashivratri katha in hindi (महशिवरात्रि कथा)

महाशिवरात्रि कथा

भगवान शिव की अनुपम महिमा सुनकर एक बार ऋषियों ने महात्मा सूत जी से पूछा

के पूर्व काल में किसने इस उत्तम महाशिवरात्रि के व्रत का पालन किया था ?

तथा अनजाने में भी इस व्रत का पालन करके किस प्राणी को क्या क्या फल प्राप्त हुए ?

इस सबंद में इस उत्तम व्रत की कथा विस्तार से कहे !

तब महात्मा सूत जी ने कहा –

” हे ऋषियों ! आप सब सावधान होकर सुने , यह एक पुराणिक कथा है !

जो किसी समय श्री नारदमुनि जी से भगवान विष्णु जी से कही थी !

यह एक शिकारी की प्राचीन कथा है , जो सब पापो का नाश करने वाली है !

इसको दृष्टान्त रूप में कहता हु !”

प्राचीन काल में किसे वन में गुरु धरु नाम का एक निषाद अपने परिवार सहित रहता था !

उसका परिवार बड़ा था वह बड़ा बलवान और क्रूर सवाब का था !

वह धनुष धारण करके क्रूर हिंसक कर्मो में त्यार रहता था !

अपना तथा अपने परिवार का पालन पोषण इसी क्रूर वृति द्वारा किया करता था !

वह प्रतिदिन वन में जाकर पक्षियों , हिरणो , खरगोशो आदि

का शिकार करके परिवार का पालन पोषण किया करता था

तथा चोरियां लूटमार आदि दुष्ट काम किया करता था !

वह बचपन से ही क्रूर कर्मो का करने का आदि था !

इस प्रकार वन में रहते हुए उस दुष्टात्मा निषाद का बहुत समय बीत गया !

तदनन्तर एक दिन संयोग बष शुभ फल प्रदायनी महाशिवरात्रि चतुर्दशी तिथि आगयी !

परन्तु विहड़ जंगल में रहने वाला वह निषाद इस तथ्य से अनजान था !

उसी दिन उसके माता पिता और गर्ववती पत्नी ने भूख से व्याकुल होकर , उससे आग्रह किया ”

हे वनचर ! आज तो घर में कुछ भी खाने को नहीं है

इसलिए किसी भी तरह भोजन लाने का परवंद करो !”

अपने परिवार के द्वारा बार बार अनुरोध करने पर

वह शिकारी तुरंत धनुष बाण लेकर मृग , बाग़

आदि पशु पक्षिओ का शिकार करने के लिए जंगल में इधर उधर खुमने लगा !

बुरे कर्म से जंगल में अनेक जगहों में दौड़ धुप करने पर भी , उसे कोई शिकार हाथ नहीं लगा

तथा संध्या होने पर जब कोई शिकार नहीं मिला !

अब मैं क्या करू ? कहाँ जाऊ ?

आज तो कुछ नहीं मिला ! घर में जो माता पिता और बच्चे है उनका क्या होगा ?

मेरी जो गर्वपति इस्त्री है , आहार के बिना , उसकी भी क्या दशा होगी ?

अत्यंत मुझे भोजन का कुछ न कुछ उपाए करके अवश्य घर ले जाना चाहिए !”

ऐसा सोचकर वह शिकारी एक तालाब के किनारे

लगे बिल के वृक्ष पर चढ़ गया और वही थोड़ा पानी साथ लेकर बैठ गया !

संयोग से उस वृक्ष के निचे शिवलिंग पड़ा हुआ था !

शिकारी वहां बैठकर मन ही मन सोचने लगा के ” यहाँ कोई न कोई जीब जंतु पानी पिने के लिए अवश्य आएगा!

तब उसी को मार कर कृत कृत्य हो , उसे साथ लेकर खाने के लिए घर को ले जाउगा !”

ऐसे सोचकर वो शिकारी भूख प्यास से आकुल होता हुआ भी वही पेड़ की ढाल पर शिपकर बैठा रहा !

उस रात के पहले प्रहर में अचानक एक प्यासी मृगी जोर जोर से शलांगे भर्ती हुयी ,

वहां पानी पिने के लिए आ पहुंची !

सूत जी बोले हे ऋषियों !

प्रथम प्रहर की पूजा

उस मृगनी को आता देख कर , वह शिकारी बड़ा प्रसन्न हुआ

तथा मृगी को मारने के लिए उतेज होकर उसने अपने धनुष पर तीर चढ़ाया !

ऐसा करते हुए , उसके हाथ के धक्के से थोड़ा सा जल और बिल पत्र निचे पड़े हुए शिवलिंग पर गिर पड़े !

जिससे अनजाने मे शिवरात्रि के प्रथम प्रहर की पूजा संयोग से पूरी हो गयी !

उस पूजा के परताप से उस दूस्ट शिकारी के बहुत से पाप उसी समय नष्ट हो गए !

ऊपर से जल के गिरने और पत्तो के खड़खड़ाहट की आवाज सुनकर उस हिरणी ने भेह से ऊपर की और देखा !

शिकारी को देखकर वो वहभीत हो गयी

और बोली ” शिकारी तुम क्या करना चाहते हो , मेरे सामने सच सच बताओ!”

हिरणी की बात सुनकर शिकारी ने कहा तुमको मारकर मैं अपने और पाने परिवार की भूख मिटाऊंगा !

शिकारी के कठोर बचन सुनकर और उसे बाण ताने देखकर मृगी सोचने लगी ”

अब मैं क्या करू ? कोई उपाए सोचती हु ”

ऐसा विचार कर उसने शिकारी को बोला मेरे मॉस से तुमको सुख होगा ,

मेरे इस वृथा शरीर के लिए इससे अधिक महान पुण्य का कार्य क्या हो सकता है ?

उपकार करने वाले प्राणी को इस लोक में जो पूण प्राप्त होता है

उसका सो बर्षो में भी वर्णन नहीं किया जा सकता !

परन्तु मेरे बच्चे सब मेरे घर पर है मई उनको अपनी बहन और पति को सौंपकर लोट आउंगी !

तुम मेरी बात को मिथ्या न समझो सत्य में ही सबकुछ स्थित है !”

सूत जी बोले मृगी के सबकुछ कहने पर

और शिकारी को उसकी बात न मानने पर वहभीत होकर मृगी ने यह कहना आरम्भ कर दिया

हे शिकारी ! सुनो मई तुम्हारे सामने ऐसी सुगंद खाती हु ,

ब्राह्मण जदहि ज्ञान वेचे और तीनो काल संध्या न करे पति की आज्ञा का उलंघन करके

इच्छा अनुसार आचरण करने वाली इस्त्रियो को जिस पाप की प्राप्ति होती है ,

भगवान शिव से विमुख रहने वाले ,

धर्म को लगने वाले तथा विश्वास घात करने वाले लोगो को जो पाप लगता है,

मैं उन्ही से पीड़ित हो जाऊं जदहि मई लौटकर न आऊं !”

अनेक कसमें खाकर जब मृगी खड़ी हो गयी तब शिकारी ने कहा ,

अच्छा अब तुम अपने घर को जाओ !

तब वह मृगी पानी पीकर अपने घर को चली गयी !

इतने में ही पहला प्रहर शिकारी के जागते ही बीत गया !

दूसरे प्रहर की पूजा

तब उस मृगी की दूसरी बहन उसकी राह देखती हुयी वहां पहुंची !

शिकारी ने फिर बाण को धनुष से खींचा

ऐसा करते समय पहले की भांति शिवलिंग के ऊपर जल और बिल पत्र गिरा

भगवान शिव की दूसरे प्रहर की पूजा सम्पन हो गयी ,

तो भी शिकारी के लिए पुण्य और सुखदायनी हो गयी !

मृगी ने उसे बाण खींचते देख पुछा यह क्या करते हो ?

शिकारी ने उत्तर दिया , मैं अपने भूखे परिवार का पोषण करने के लिए तुझे मरुँगा !

मृगी बोली शिकारी मेरी बात सुनो मेरा देह धारण सफल हो गया ,

क्युकी इस अनित्य शरीर के द्वारा उपकार होगा !

मैं अपने बच्चो को अपने पति को सौंपकर आती हु !

शिकारी बोला मैं तुझे जरूर मारुंगा !

मृगी भगवान विष्णु की शपत खाती हुयी बोली हे शिकारी जदहि मैं लौटकर न आऊं

तो मेरे सारे पुण्य नष्ट हो जाए , बचन देकर उससे पलट जाने वाला अपने पुण्यो का नाश करता है !”

जो पुरष अपनी पत्नी को त्यागकर दूसरी के पास जाता है

भगवान विष्णु का भक्त होकर शिव की निंदा करता है ,

माता पिता का श्राद न करके व्यर्थ बिता देता है ,

दिए हुए वायदे को पूरा नहीं करता , ऐसे लोगो को पाप लगने वाला मुझे भी लगे ,

जदहि मैं लौटकर वापिस न आऊं !

सूत जी कहते है शिकारी ने मृगी से कहा जाओ !”

मृगी जल पीकर अपने घर को गयी

इतने में रात का दूसरा प्रहर शिकारी के जागते जागते बीत गया !

तीसरे प्रहर की पूजा

इसी समय तीसरा प्रहर आरम्भ हो जाने

पर हिरणी के आने में देर होने पर शिकारी उसकी खोज करने लगा !

इतने पर एक मृग को उसने देखा उसे देख बहुत खुश हुआ और तीर चलने लगा !

ऐसा करते फिर संयोग से जल और बिल पत्र शिवलिंग पर गिरे ,

इससे शिकारी की सौभाग्य से भगवान शिव की तीसरे प्रहर की पूजा सम्पन हुयी !

शिकारी ने मृग को देखकर कहा , मैं अपने परिवार को भोजन देने के लिए तेरा वध करूंगा !

मृग बहुत खुश हुआ मृग ने कहा मेरा हष्ट पुष्ट होना सफल हो गया !

जिसका शरीर परोपकार के काम नहीं आता उसका जीवन व्यर्थ है ,

तथा बह परलोक में भी नरकगामी होता है !

मैं अपने बच्चो को उनकी माता के हाथ सौंपकर सबको धीरज देकर जहाँ लोट आउगा !

उसके ऐसा कहने पर शिकारी मन ही मन चकित हुआ !

उसका हृदय शुद्ध हुआ और उसके सारे पाप नष्ट हो चुके थे !

शिकारी कुछ सोचकर बोला जो जो जहाँ आये सब तुम्हारी ही तरह बाते बना कर चले गए ,

अभी तक नहीं आये !

मृग तुम भी इस संकट में हो झूठ बोलकर चले जाओगे आज मेरा निर्वाह कैसे होगा?

मृग बोला सारा चराचर ब्रह्माण्ड सत्य से ही टिका हुआ है !

जिसकी बानी जूठी है उसका पुण्य उसी क्षण नष्ट हो जाता है !

संध्या काल में मैथुन और शिवरात्रि के दिन भोजन करने से ,

जूठी गवाही देने से , ध्रोहर को हड़प लेने से ब्राह्मण को जो पाप लगते है वह मुझे भी लगे जदहि मैं लोटू न !

जिसके मुख से कभी शिव का नाम नहीं निकलता पर्व के दिन श्री फल को तोडना , मॉस का भक्षण करना

शिव की पूजा किये बिना भस्म लगाए बिना जो भोजन करता है ,

इन सब का पाप मुझे लगे अगर मैं न आऊं तो !”

सूत जी कहते है शिकारी बोला जाओ शीघ्र लौटना !

चौथे प्रहर की पूजा

मृग पानी पीकर चला गया वे तीनो अपने आश्यर्य स्थली पर मिले तीनो प्रतिवध हो चुके थे !

आपस में अपने आप को सत्य के पाश से बंदेह हुए उन्होंने निश्चय किया की वहां अवश्य जाना चाहिए !

और अपने बच्चो को आश्वाशन देकर सब जाने को त्यार हो गए !

बड़ी मृगी ने अपने स्वामी से कहा स्वामी आपके बिना ये बच्चे कैसे रहेंगे ?

प्रभु ! छोटी मृगी बोली मैं तम्हारे सेविका के नाते शिकारी के पास जाती हु !”

यह सुनकर मृग बोला ” मैं ही वहां जाता हु क्युकी बच्चो की रक्षा माता से ही होती है !

स्वामी की यह बात सुनकर मृगियों ने धर्म के अनुसार उनको न स्वीकारा !

अपने पति से प्रेम पूर्वक बोली ” प्रभु पति के बिना इस जीवन को धिकार है ”

तब उन सब ने बच्चो को तस्सली देकर पड़ोसियों को सौंप दिया और स्वयं उस जगह को प्रस्थान किया

जहा वह शिकारी श्रोमणि उनकी प्रतीक्षा पर बैठा था !

उन्हें जाते देख उनके बच्चे भी पीछे पीछे चले !

उन्होंने यह निश्चय कर लिया के हमारे माता पिता की जो गति होगी वही हमारी हो !

शिकारी उन सब को साथ आता देख बड़ा खुश हुआ !

उसने धनुष रख दिया उस समय पुण्य जल

और बिल पत्र शिवलिंग के ऊपर गिरे ऐसे शिव की चौथे प्रहर की पूजा पूर्ण हो गयी !

भगवान शिव के दर्शन

उस समय शिकारी के समस्त पाप नष्ट हो गए इतने में दोनों मृगिया और मृग बोले शिकारिओं श्रोमणि !

शिगर किरपा करके हमारे शरीरो को ग्रहण करो उनकी ये बात सुनकर शिकारी को बड़ा आश्चर्य हुआ !

शिव पूजा के प्रवाभ से उसको दुर्लभ ज्ञान प्राप्त हुआ !

उसने सोचा ” ये मृग ज्ञान हिन् पशु होने पर भी धन्य है क्युकी अपने शरीर से ही परोपकार में लगे हुए है !

मैंने इस समय मनुष्य जन्म पाकर भी व्यर्थ गवाया !

अपने बच्चो के शरीरो को पालने के लिए दुसरो के शरीर की हिंसा की !

हाय ! ऐसे पाप करके मेरी क्या गति होगी ?
मैं किस गति को प्राप्त होऊंगा ?

मैंने जन्म से लेकर अब तक जो पाप किये उन सब का मुझे इस समय स्मरण हो रहा है !

धिक्कार है मेरे जीवन को !” इस प्रकार ज्ञान अनुभव होकर शिकारी ने अपने बाण को रोका और कहा ”

श्रेष्ठ मृगो तुम धन्या हो सब वापिस जाओ !

शिकारी के ऐसा कहने पर भगवान शिव बड़े प्रसन्न हुए

उन्होंने शिकारी को अपने चमत्कारी एवं दिव्या स्वरूप का दर्शन कराया !

किरपा पूर्वक शिकारी के शरीर को स्पर्श करके प्रेम से कहा !

भील ( शिकारी ) मैं तुम्हारे व्रत से अति प्रश्न हु ! वर मांगो !”

शिकारी भी शिव के दिव्या रूप को देखकर जीवन मुक्त हो गया

और ” मैंने सब कुछ पा लिया ” ऐसा कहते हुए शिव के आगे गिर पड़ा !

उसके इस भाव को देखकर शिव भी मन ही मन बड़े प्रसन्न हुए

और उसे ” गुह ” नाम देकर कृपा दृष्टि देखते हुए उन्होंने कुछ दिव्या वर प्रदान किये

शिवजी बोले ” शिकारी सुनो ” आज से तुम श्रृंग वेर पुर में उत्तम राजधानी

का आश्रम लेकर दिव्या भोगो का उपभोग करो !

तुम्हारे वंश की वृद्धि निर्विगन रूप से होती रहेगी !

देवता भी तम्हारी प्रशंशा करेंगे !

शिकारी ! मेरे भक्तो मेंस्नेह रखने वाले भगवान श्री राम एक दिन तुम्हारे घर पधारेंगे !

तुम मेरी सेवा में लगकर दुर्लव मोक्ष पा जाओगे !”

इसी समय मृग भगवान शिव के दर्शन और प्रणाम करके मृग जूनि से मुक्त हो गए

तथा दिव्या देह धारी हो विमान पर बैठकर शिव के दर्शन मात्र से श्राप मुक्त होकर दिव्या धाम को चलेगये !

तब से अर्बुध पर्वत भगवान शिव व्यादेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हो गए ,

जो दर्शन और पूजन करने पर तत्काल भोग और मोक्ष प्रदान करने वाले है !

महाऋषियो वह शिकारी भी उस दिन से दिव्या भोगो का उपभोग करता हुआ अपने राजधानी में रहने लगा !

उसने भगवान श्री राम की किरपा पाकर शिव धाम का मोक्ष प्राप्त किया !

अनजाने में ही इस व्रत का अनुष्ठान करने से उसको मोक्ष मिल गया ,

फिर जो भक्ति भाव से जुक्त होकर इस व्रत को करते है ,

वो शिव का शुभ मोक्ष प्राप्त करले , इसके लिए तो कहना ही क्या है !

सम्पूर्ण शास्त्रों के अनुसार इस शिवरात्रि व्रत को सबसे उत्तम बताया गया है !

इस लोक में जो न न प्रकार के व्रत , तीर्थ , भाँती भाँती के दान अनेक प्रकार के जग्य

तरह तरह के तप के बरावर भी इस शिवरात्रि व्रत की तुलना नहीं कर सकते

अपना फायदा चाहने वाले मुष्य को पुण्य इस व्रत को ग्रहण करना चाहिए !

इस व्रत के अनुष्ठान से सांसरिक के साथ साथ भक्ति मुक्ति की प्राप्ति होती है

यह शुभ शिवरात्रि व्रत व्रतराज के नाम से प्रसिद्ध है !

Mahashivratri व्रत रखने का महत्व

(Importance of Mahashivratri vrat)

Mahashivratri का व्रत लोग अपनी मनोकामना पूर्ण करने के लिए रखते है

जिनमें क्वारी कन्या मनचाहा वर पाने के लिए रखती है !

विवाहित औरते घर में सुख शांति और पुत्र प्राप्ति के लिए रखती है

कहा जाता है की भगवान शिव का नाम भोलेनाथ इस लिए पड़ा

क्युकी वह बड़े भोले भाले और अपने भक्तो की मनोकामना तुरंत पूर्ण करते है !

भगवान शिव आरती
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