ऐतहासिक

मन की शांति पाने के लिए हिन्दू धर्म में है दान का महत्व !

दान का महत्व

हिन्दू धर्म में दान का महत्व !

कलयुग में मन की शांति पाने के लिए हिन्दू धर्म में है दान का महत्व !

मृत्यु के पश्चात भी निष्काम भाव से दिया हुआ दान ही काम आता है ,

किन्तु आजकल किसी व्यक्ति को दान देने की बात कहें तो वो कहेगा ,

‘ अपनी ही आवश्यकता पूरी नहीं होती तो दान कहाँ से करे !’

यह आवश्यकता पूरी नहीं होती भी एक विचित्र तमाशा है ! बुद्धिमता की बात तो यह है की जितनी आय हो ,

व्यय उसे कम करे ! आय कम हो जा अधिक उसमें से एक हिस्सा दान के लिए अवश्य सुरक्षित रखे !

परन्तु आज ‘ खाओ और पियो ‘ का सिद्धांत संसार का सिद्धांत बन गया है !

हर समय प्रत्येक स्थान पर यही ध्वनि सुनाई देती है ‘ और लाओ , और लाओ ‘!

ऐसी अवस्था में दान कोण करे , किन्तु यह कहना ठीक नहीं है !

जो लोग मन की शांति चाहते है , उन्हें समझना चाहिए की जो व्यक्ति अंधाधुन्द खर्च करता है

और अपनी आवश्यकताओं को निरन्तर बढ़ाये चलता है जो आय से अधिक व्यय करने के बाद

आय बढ़ाने का प्रयत्न करता है , उसे शांति कभी नहीं मिल सकती !

मन की शांति के लिए आवश्यक है की व्यय को आय से नीचे रखे ! आत्मा की उन्नति के लिए

जरुरी ही की जो गरीब और दुखी है , उन्हें दान देकर निष्काम सेवा करे !

हिन्दू धर्म में श्री कृष्ण द्वारा दान का महत्व !

श्रीमत भगवत गीता में श्री कृष्ण ने अर्जुन को दान का महत्व समझाते हुए बताया है की दान देना ही कर्तव्य है

तथा देश काल और पात्र को देखकर किया गया दान सात्विक कहलाता है !

क्लेशपूर्वक तथा फल प्राप्ति के उद्देश्य से दिया गया दान राजस दान कहलाता है

तथा जो दान बिना सत्कार अथवा तिरस्कारपूर्वक दिया जाता है , जो कुपात्र तथा

नीच कर्म वालो को दिया जाता है , वह तामस दान कहलाता है !

समस्त धर्मो में दान का महत्व !

विश्व के समस्त धर्मो में दान को विशेष महत्व दिया गया है ! दान का साधारण अर्थ किसी भी

वस्तु का अपने अधिकार से दूसरे को अर्पण कर देना है !

दान का उद्देश्य त्याग तथा परोपकार की भावना से ओत्त – प्रोत्त माना गया है

जिससे कुछ बदले में लेने की कामना न हो ! निष्काम भाव से दिया गया दान ही धर्म माना जाता है

लेकिन आज मनुष्य अपने को समाज में अग्रणी पंक्ति बताने अथवा दानवीर कहलाने की ललक में दान देते है ,

यह त्याग की भावना से परे है ! दींन दुखियों की सेवा तथा परोपकार हमेशा शालीनता से होना चाहिए !

दान की भावना परहित में हो क्युकी दान का आधार भावनात्मक क्रिया से जुड़ा है !

परमार्थ के उद्देश्य से दान का अपना अलग ही महत्व है !

आज का भौतिक युग धन को अधिक महत्व देता है लेकिन धन का उपयोग पुण्य कार्यो में

लगाया जाए तो उसका फल आनंदवर्धन होता है !

आज धनी परिवारों की स्थिति विचित्र है ! धन का उपयोग गलत व्यसनों तथा कार्यो में

किया जाता है जिससे अवगुण ही पनपते है !

दान सुपात्र को ही दिया जाए जिससे उसका उपयोग हो सके यानी दींन दुखी , अनाथ , अपंग

तथा भिखारी को दिया गया दान पवित्र कहलाता है !

आम जनता के जनहित में दिया गया दान कल्याणकारी होता है ! दान की परिस्थिति

आवश्यकता के अनुकूल हो तो अधिक महत्व रखता है ताकि उसका उपयोग कारक सिद्ध हो सकता है !

हिन्दू धर्म में विद्वानों द्वारा दान का महत्व !

दानदाताओ के लिए विद्वानों का स्पष्ट संकेत है  की प्यासे को पानी , भूखे को रोटी , तथा

जीवन रक्षा हेतु रक्तदान आदि सभी कार्य दान की पुण्य श्रेणी में आते है !

मनुष्य को स्व्य को शांति तथा संतोष प्राप्त होता है !

संकट के समय जैसे बाढ़ , भूकंप , आग लगने पर , दुर्घटना के समय दिया गया दान भी

परोपकार के रूप में होता है ! वास्तव में दान , त्याग , सेवा , प्रेम , उदारता , कृपा से दिया जाता है !

इसलिए दान मनुष्य मात्र की कल्याणकारी भावना को प्रबल बनाता है !

 

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